जस्टिस अरुण मिश्रा और एस.ए. नजीर की पीठ ने यह आदेश उत्तर प्रदेश के एक सरकारी डॉक्टर के मामले में दिया, जिन्होंने यूपी स्वास्थ्य सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया था। पीठ ने कहा कि जब किसी कर्मचारी की सेवाओं की जरूरत हो तो उसे सेवानिवृत्ति देने से मना किया जा सकता है।
डॉ. अचल सिंह मेडिकल हेल्थ और फैमिली वेलफेयर सेंटर में संयुक्त निदेशक के रूप में काम कर रहे थे। उन्होंने सरकार को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का नोटिस दिया। लेकिन सरकार ने उनके आवेदन को ठुकरा दिया। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की और हाईकोर्ट ने नियमों (फंडामेंटल रुल्स, नियम 56-सी) को देखते हुए उन्हें सेवानिवृत्त करने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट आ गई। सरकार ने कहा कि प्रदेश स्वास्थ्य सेवा में डॉक्टरों की भारी किल्लत है इस वजह से सरकार ने उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के आवेदन को स्वीकार नहीं किया गया। वहीं डॉक्टर के वकीलों ने दलील दी कि रिटायरमेंट लेना कर्मचारी का अधिकार है और उसे तभी रोका जा सकता है जब उसके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित हो। उन्होंने कहा कि एक बार सेवानिवृत्ति के लिए तीन माह का नोटिस दे दिया गया तो उसके बाद उन्हें उक्त तारीख से रिटायर मान लिया जाता है। कोर्ट ने कहा कि भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं अति गरीब लोगों के लिए है। नहीं तो देश में चेरीटेबल मेडिकल पेशे का व्यावसायीकरण हो जाएगा। पीठ ने कहा कि जब किसी डॉक्टर का एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरण किया जाता है तो वह पद से इस्तीफा दे देने की याचिका देता है। वह तभी पद पर लौटता है जब उसे उसी पद पर बहाल किया जाता है। ऐसी स्थिति में लोगों को अच्छे डॉक्टरों की सेवाओं से महरूम नहीं किया जा सकता है ।By Law Expert and Judiciary Exam.
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ऐसे डाक्टरो का क्या जो शासकीय सेवाओं मे रहते हुऐ भी प्राईवेट प्रैक्टिस कर रहे है और मोटी कमाई कर रहे है।ऐसे नर्सिंग होम भी है जहां पर दवाईया भी बेची जाती है वह भी बिना लाईसैंस के ।
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