कोई आदेश कितना भी गलत क्यों न हो उसे CrPC की धारा 362 के तहत वापस नहीं लिया जा सकता है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कोई आदेश कितना भी गलत क्यों न हो, उसे सीआरपीसी की धारा 362 के तहत वापस नहीं लिया जा सकता ।

“कोई आदेश कितना भी गलत क्यों न हो, उसे ज्ञात क़ानून के तहत ही ठीक किया जा सकता है, सीआरपीसी की धारा 362 के तहत नहीं” सुप्रीम कोर्ट.सुप्रीम कोर्ट  ने मुहम्मद ज़ाकिर बनाम शबाना मामले में कहा है कि कोई हाईकोर्ट अपने किसी पूर्व आदेश को बहुत ही गलत बाताते हुए सीआरपीसी की धारा 362 के तहत वापस नहीं ले सकता। न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ कर्नाटक हाईकोर्ट के एक “वापसी” आदेश के खिलाफ दायर आपराधिक याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने एक मामले में 10 दिन पहले दिए अपने आदेश को वापस लेते हुए कहा था, “सीआरपीसी की धारा 362 जो कहे,इससे पहले इस अदालत ने 18 अप्रैल 2017 को जो आदेश दिया था वह बहुत ही गलत था इसलिए यह आदेश वापस लिया जाता है। इस याचिका को दुबारा दायर करने का आदेश दिया जाता है और रजिस्ट्री को आदेश दिया जाता है कि वह पहले दिए गए आदेश को अपलोड नहीं करे और इस बात को गौर करे कि यह आदेश अब वापस ले लिया गया है।” हाईकोर्ट ने जो पहले आदेश दिया था उसका अब कोई नामोनिशान नहीं है। ऐसा लगता है कि हाईकोर्ट जिस मामले की सुनवाई कर रहा था वह सत्र अदालत के समक्ष एक आपराधिक अपील के तहत जारी नोटिस को दी गई चुनौती थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को सीआरपीसी की धारा 362 के तहत सही करने के लिए इस अपील को वापस नहीं लेना चाहिए था। पीठ ने कहा, “कोई फैसला चाहे कितना भी गलत क्यों न हो, इसे क़ानून की ज्ञात प्रक्रिया के तहत ही ठीक किया जाना चाहिए था। धारा 362 का पूरा उद्देश्य लिपिकीय गलतियों को ठीक करना है। अदालत ने इस आदेश के साथ जो किया है वह कोई लिपिकीय या गणितीय गलतियाँ नहीं थी; वह मामले को उसके मेरिट के आधार पर दुबारा सुनवाई करना चाहती थी क्योंकि जज के अनुसार पहले दिया गया आदेश पूरी तरह गलत था। इसकी इजाजत क़ानून के तहत नहीं है।” पीठ ने इस बात पर गौर किया कि आपराधिक अपील प्रधान सिटी दीवानी और सत्र जज, बेंगलुरु के समक्ष लंबित है, हाईकोर्ट द्वारा दिए गए मूल आदेश को निरस्त कर दिया और सत्र अदालत को इस मामले को शीघ्र निपटाने को कहा।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गुजारा भत्ता देने वाले पिता को बेटी से मिलने का भी हक : दिल्‍ली हाईकोर्ट